Tuesday, December 4, 2012

(मुनव्वर राना)

नए कमरों में चीजे पुरानी कौन रखता है,
परिंदों के लिए शहरो में पानी कौन रखता है,
ये तो हमी थे जो गिरती हुई दीवार को थामे रहे वर्ना,
सलीके से बुजुर्गो की निशानी कौन रखता है
(मुनव्वर राना)

हुकूमत

मै दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है ,
हुकूमत के इशारे पे तो मुर्दा बोल सकता है ,
यहाँ पे नफरतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये है ,
लुटी इस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है 
हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती ,
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है .

Again Amazing Lines By Munawwar Rana

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं

उछलते—खेलते बचपन में बेटा ढूँढती होगी
तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है

Again Amazing Lines By Munawwar Rana

उठ मेरी जान

तू जो बेजान खिलोनों से बहल जाती है 
तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है 
पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है 
बनके सीमाब हर इक जर्फ में ढल जाती है 
जिस्त के आहनी साँचे में ढलना है तुझे 
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

अंधकार बढ़ता जाता है!!" -- हरिवंशराय बच्चन

अंधकार बढ़ता जाता है!!

मिटता अब तरु-तरु में अंतर,
तम की चादर हर तरुवर पर,
केवल ताड़ अलग हो सबसे अपनी सत्ता बतलाता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

दिखलाई देता कुछ-कुछ मग,
जिसपर शंकित हो चलते पग,
दूरी पर जो चीजें उनमें केवल दीप नजर आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

ड़र न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा स्वर कर
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!"
-- हरिवंशराय बच्चन

''रिश्ते''

रिश्ते 

कभी हमारे मन भाते हैं,

कभी हैं इनसे दिल जलते,
कभी हमें ख़ुशी दे जाते हैं,

कभी हैं इनसे गम मिलते,
कभी निभाना मुश्किल इनको,

कभी हैं इनसे दिन चलते,
कभी तोड़ देते ये दिल को,

कभी होंठ इनसे हिलते,
कभी ये लेते कीमत खुद की,

कभी ये खुद ही हैं लुटते,
कभी जोड़ लेते ये जग को,

कभी रोशनी से कटते,
कभी चमक दे जाते मुख पर,

कभी हैं इनसे हम छिपते,
कभी हमारे दुःख हैं बांटते,

कभी यही हैं दुःख देते,
इतने पर भी हर जीवन के प्राणों में ये हैं बसते,
और नहीं कोई नाम है इनका हम सबके प्यारे''रिश्ते''

अस्तित्व

मुहब्बत 
दीप शिखा 
और नदी का प्रवाह 
तीनो में कितनी समानता है
जब तक 
मिट न जाये अस्तित्व 
तब तक 
थमने का नाम नहीं लेती
तीनों

आज भी जिन्दा है..एहसास तेरा!

दूब के कोमल तिनकोँ पर

मखमली ओस की

बूंदोँ की तरह

फैली है आज भी

मन के आंगन मेँ

तेरे एहसास की खुश्बू,

¤

तेरे संग

बिताये लम्होँ की एक किरण

चली आती है

चुपके से मेँरे पास

जैसे कोई भँबरा

फूलोँ के इर्द-गिर्द

मंडराता है

तेरा एहसास भी

घेर लेता है

मुझे

अपनी परछाइयोँ के बीच(दरमियां)

¤

तन्हाई की दहलीज पर

जैसे

ठण्डा,मंद हवा का

कोई एक झोँका

भर देता है

तन मेँ सिहरन,

¤

तेरा एहसास भी

दिल के हर कोने मेँ

अपनी

अमिट छाप छोड़ जाता है

फूलोँ मेँ निहित खुश्बू की तरह

मेँरे भीतर

आज भी जिन्दा है..एहसास तेरा!

Wednesday, May 23, 2012

एक चुटकी नींद

राही मासूम रजा को जीते हुए..

एक चुटकी नींद की मिलती नहीं
अपने ज़ख़्मों पर छिड़कने के लिए
हाय हम किस शहर में मारे गये

घंटियाँ बजती हैं
ज़ीने पर कदम की चाप है
फिर कोई बेचेहरा होगा
मुँह में होगी जिसके मक्खन की ज़ुबान
सीने में होगा जिसके इक पत्थर का दिल
मुस्कुराकर मेरे दिल का इक वरक़ ले जाएगा ......

Friday, April 27, 2012

आंख की जमीन

अश्क का साथ छूटा 
तो आंखे उदास थीं
और 
तुमसे बहुत नाराज भी
तुमने छीन जो ली थी
उनकी अमानत सब
अगर लौटा सको
तो देर मत करना
कि आंख की जमीन 
अब भी सूखी है
और
अश्क की तो जात पर ही
आफत है
गुनाह था
जी भर के देखने का महज
तुमने तो बारिश चुरा ली आंखों से.........

Friday, March 2, 2012

ज़िन्दगी का अलाव

बुझने चला है अब इस ज़िन्दगी का अलाव
साँसे भी गीली लकड़ियों सी दुन्धाने लगी है
हो सके तो आ कर बुझा दे इस इंतज़ार को
दर्द के धूं से रूह की आँखें डब-डबाने लगी है

Saturday, February 25, 2012

ठांव बंधु !

निराला की लेखनी के बारे में कुछ कह सकना मेरे बस की बात नहीं है, बस निराला की इस कविता को पढ़ते रहने की अंतहीन ऋंखला है....जो आज भी जारी है...

बांधो न नांव इस ठांव बंधु !
पूछेगा सारा गांव बंधु !
यह घाट वही जिस पर हंसकर 
वह कभी नहाती थी धंसकर
आंखें रह जाती थीं फंसकर 
कंपते थे दोनों पांव बंधु !
बांधो न नांव इस ठांव बंधु !

वह हंसी बहुत कुछ कहती थी
फिर भी अपने में रहती थी
सबकी सुनती थी सहती थी
देती थी सबके दांव बंधु !
बांधो न नांव इस ठांव बंधु !

"निर्वासित अकेलापन"

आलोक श्रीवास्तव की यह कविता एक सांस में पीने जैसी है। मुझे नहीं लगता कि अपनेपन को जीने की खातिर इससे भी बेहतर कुछ हो सकता है.....कविता का शीर्षक है, "निर्वासित अकेलापन"

तुम्हारी मां को चिंता है तुम्हारे भविष्य की 
कभी उन्होंने प्रेम किया था 
और एवज में मिली 
कठोर और अकेली जिंदगी
दुख के दिन मिले, हताशा और कड़वाहट

वे नहीं जानतीं
कोई तुम्हें प्यार करने लगा है
कोई न जाने कब
तुम्हारे सिरहाने वसंत रख आता है
और अपने सारे वजूद में
तुम्हारे विछोह का दर्द लिये राह-गली
तुम्हारी उम्र की तमाम लड़कियों में
तुम्हें ढूंढता फिरता है
तुम भी नहीं जानतीं कि
कोई तुम्हें प्यार करने लगा है

तुम्हारी मां जब तुम्हारी आंखों में देखती होंगी
तो क्या बीस बरस की वह लड़की भी दिखती होगी
जो किसी से टूट कर प्यार करती थी

जानता हूं अगर कभी उस लड़की की छाया भी
वो देख लेती होंगी तो तुम्हें
अनजान बावड़ियों, निर्जन नदी और सूनी कब्रों के पास
न जाने की ताकीद करती होंगी

और तुम भी तो नहीं जानती होंगी कि
इन्हीं जगहों पर कोई
समूचा एक मौसम लिये बैठा होगा
सिर्फ इसलिये कि
बस तुम्हारी एक लट भर संवार दे
तुम्हारे दुपट्टे का एक कोर चुपके से बस एक बार छू भर ले

तुम्हारी मां नहीं जानतीं
कि कोई तुम्हें प्यार करने लगा है
और उसके हिस्से आये हैं
दुख के दिन, निर्वासित अकेलापन
और कठोर जिंदगी ।

Monday, February 20, 2012

एक बेहतरीन कलम से

एक बेहतरीन कलम से। नाम मिल जाए तो बात ही क्या है..

अभी कुछ भी नहीं बदला
दरख्तों पर वही पत्ते
अभी भी मुस्कुराते हैं
अभी तक सुरमई शामें
हमारे साथ होती हैं
अलमारियों में सारे तोहफे
गुनगुनाते हैं
तुम्हारे खत अभी भी रात की तनहाई में
मुझसे तुम्हारी बात करते हैं
बहुत से साल गुजरे हैं
बहुत सा वक्त बीता है
मेरी चाहत नहीं बीती
मेरी हिम्मत नहीं गुजरी
अगर चाहो
अगर समझो
मेरी मानो
तो लौट आओ........

पाश की कलम से।

पाश की कलम से। पंजाबी भाषा का ये क्रांतिकारी कवि उन सभी नौजवानो की जान है जो जिंदगी को गले तक भरकर जीने में यकीन रखते हैं। पाश के लिए मोहब्बत भी गले तक जिंदगी में डूबने का नाम है। पाश को पढ़ना और पढ़ते रहना एक ऐसी आदत है जो जीने की आदत से भी कहीं ज्यादा नजदीक महसूस होती है.....

अब विदा लेता हूं
मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूं
मैंने एक कविता लिखनी चाही थी
सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं

उस कविता में
महकते हुए धनिए का जिक्र होना था
ईख की सरसराहट का जिक्र होना था
उस कविता में वृक्षों से टपकती ओस
और बाल्टी में दुहे दूध पर गाती झाग का जिक्र होना था
और जो भी कुछ
मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा
उस सब कुछ का जिक्र होना था

उस कविता में मेरे हाथों की सख्ती को मुस्कुराना था
मेरी जांघों की मछलियों ने तैरना था
और मेरी छाती के बालों की नरम शॉल में से
स्निग्धता की लपटें उठनी थीं
उस कविता में
तेरे लिए
मेरे लिए
और जिन्दगी के सभी रिश्तों के लिए बहुत कुछ होना था मेरी दोस्त

मेरी दोस्त, हम याद रखेंगे
कि दिन में लोहार की भट्टी की तरह तपने वाले
अपने गांव के टीले
रात को फूलों की तरह महक उठते हैं
और चांदनी में पगे हुई ईख के सूखे पत्तों के ढेरों पर लेट कर
स्वर्ग को गाली देना, बहुत संगीतमय होता है
हां, यह हमें याद रखना होगा क्योंकि
जब दिल की जेबों में कुछ नहीं होता
याद करना बहुत ही अच्छा लगता है

मैं इस विदाई के पल शुक्रिया करना चाहता हूं
उन सभी हसीन चीज़ों का
जो हमारे मिलन पर तंबू की तरह तनती रहीं
और उन आम जगहों का
जो हमारे मिलने से हसीन हो गई
मैं शुक्रिया करता हूं
अपने सिर पर ठहर जाने वाली
तेरी तरह हल्की और गीतों भरी हवा का
जो मेरा दिल लगाए रखती थी तेरे इंतज़ार में
रास्ते पर उगी हुई रेशमी घास का
जो तुम्हारी लरजती चाल के सामने हमेशा बिछ जाता था
टींडों से उतरी कपास का
जिसने कभी भी कोई उज़्र न किया
और हमेशा मुस्कराकर हमारे लिए सेज बन गई
गन्नों पर तैनात पिदि्दयों का
जिन्होंने आने-जाने वालों की भनक रखी
जवान हुए गेंहू की बालियों का
जो हम बैठे हुए न सही, लेटे हुए तो ढंकती रही
मैं शुक्रगुजार हूं, सरसों के नन्हें फूलों का
जिन्होंने कई बार मुझे अवसर दिया
तेरे केशों से पराग केसर झाड़ने का
मैं आदमी हूं, बहुत कुछ छोटा-छोटा जोड़कर बना हूं
और उन सभी चीज़ों के लिए
जिन्होंने मुझे बिखर जाने से बचाए रखा
मेरे पास शुक्राना है
मैं शुक्रिया करना चाहता हूं

प्यार करना
और लड़ सकना
जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है
धूप की तरह धरती पर खिल जाना
और फिर आलिंगन में सिमट जाना
बारूद की तरह भड़क उठना
और चारों दिशाओं में गूंज जाना -
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा
जिन्हें जिन्दगी ने बनिए बना दिया

जिस्म का रिश्ता समझ सकना,
खुशी और नफरत में कभी भी लकीर न खींचना,
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फि़दा होना,
सहम को चीरकर मिलना और विदा होना,
बड़ी शूरवीरता का काम होता है मेरी दोस्त,
मैं अब विदा लेता हूं

तुम भूल जाना
मैंने तुम्हें किस तरह पलकों के भीतर पालकर जवान किया
मेरी नज़रों ने क्या कुछ नहीं किया
तेरे नक्शों की धार बांधने में
कि मेरे चुंबनों ने कितना खूबसूरत बना दिया तुम्हारा चेहरा
कि मेरे आलिंगनों ने
तुम्हारा मोम-जैसा शरीर कैसे सांचें में ढाला

तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त
सिवाय इसके,
कि मुझे जीने की बहुत लालसा थी
कि मैं गले तक जिन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे हिस्से का जी लेना, मेरी दोस्त
मेरे भी हिस्से का जी लेना !

Friday, February 17, 2012

तुम खुद को समझ सकतीं

गर ख्याल की नसें होतीं
गर तुम नसों को गिन सकतीं
गर उम्मीद का जिस्म होता
जिसमें थोड़ा भी लहू होता

गर शाम की हस्ती में
थोड़ी भी कसक होती
और रात की कश्ती में
माझी की महक होती

गर किताब के पन्नों में होती
वक्त की कोई गौरय्या
गर घुटनों पर बैठी
उसके डैनें तुम गिन सकतीं

गर तुम ऐसा कर सकतीं
मैं कुछ भी नहीं कहता
तुम खुद को समझ सकतीं
तुम खुद ही समझ सकतीं..............

तुम खुद को समझ सकतीं

गर ख्याल की नसें होतीं
गर तुम नसों को गिन सकतीं
गर उम्मीद का जिस्म होता
जिसमें थोड़ा भी लहू होता

गर शाम की हस्ती में
थोड़ी भी कसक होती
और रात की कश्ती में
माझी की महक होती

गर किताब के पन्नों में होती
वक्त की कोई गौरय्या
गर घुटनों पर बैठी
उसके डैनें तुम गिन सकतीं

गर तुम ऐसा कर सकतीं
मैं कुछ भी नहीं कहता
तुम खुद को समझ सकतीं
तुम खुद ही समझ सकतीं..............

जॉन एलिया की कलम से--

ख्याल पर इससे बेहतर ख्याल क्या हो सकता है। दिल के बहुत भीतर की तड़प को वैसी की वैसी स्याही में उतार देने वाले यूपी के अमरोहा में जन्मे पाकिस्तान के मशहूर और अदभुत प्रतिभा के धनी कलमकार जॉन एलिया की कलम से-- 

कब उसका बिसाल चाहिए था 
बस एक ख्याल चाहिए था 
कब दिल को जवाब से गर्ज थी 
होठों को सवाल चाहिए था............

...............................

वह मेरा ख्याल थी, सो वह थी
मैं उसका ख्याल था, सो मैं था
अब दोनो ख्याल मर चुके हैं........
....................................................

और जहां सारे शब्द खत्म हो जाते हैं, सोच खत्म हो जाती है, वहां फैज के शब्द शुरू होते हैं---

न दीद (दृष्टि) है, न सुखन (शब्द), न हर्फ है न पयाम
कोई भी हीला ए तस्कीन (राहत का कोई बहाना) नहीं, और आस बहुत है
उम्मीद ए यार, नजर का मिजाज, दर्द का रंग
तुम आज कुछ भी न पूछो कि दिल उदास बहुत है.....

Wednesday, February 8, 2012

पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर की कलम से

पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर की कलम से। महज 42 साल की जिंदगी और इतना कुछ कि "जिंदगी" लफ्ज ही छोटा पड़ जाए..... 

पूरा दुःख और आधा चाँद 
हिज्र की शब् और ऐसा चाँद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चाँद

मेरी करवट पर जाग उठे
नींद का कितना कच्चा चांद

सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चांद

रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद

...........

इस लम्हा---

Pura Dukh Aur Aadha Chaand
Hijr Ki Shab Aur Aisa Chaand

Itne Ghane Baadal Ke Piche
Kitna Tanha Hoga Chaand

Meri Karvat Par Jaag Uthe
Neend Ka Kitna Kachcha Chaand

Sehra Sehra Bhatak Raha Hai
Apne Ishq Main Sachcha Chaand

Raat Ke Shayad Ek Baje Hain
Sota Hoga Mera Chaand

अमीर खुसरो की "जिहाल ए मिस्कीं"

‎13-14 वीं शताब्दी के मशहूर कवि, लेखक, संगीतकार अमीर खुसरो की "जिहाल ए
मिस्कीं" शीर्षक से अदभूत रचना जो एक साथ फारसी और ब्रज भाषा दोनो में
थी। हिंदू और मुसलमान के नाम पर बांटने वाले हमारे वक्त के पैगंबरों को
यह विरासत कब समझ में आएगी ?--

जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल (फारसी)
दुराय नैना बनाय बतियाँ (ब्रज)

किताबे हिज्राँ, न दारम ऐ जाँ (फारसी)
न लेहु काहे लगाय छतियाँ (ब्रज)

शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ
बरोजे वसलत चूँ उम्र कोताह (फारसी)

सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ। (ब्रज)

यकायक अज़दिल दू चश्मे जादू
बसद फरेबम बवुर्द तस्कीं (फारसी)

किसे पड़ी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतिया (ब्रज)

चूँ शम्आ सोजाँ, चूँ जर्रा हैराँ
हमेशा गिरियाँ ब इश्के आँ माह (फारसी)

न नींद नैंना न अंग चैना (हिंदी)
न आप आये न भेजे पतियाँ

बहक्के रोजे विसाले दिलबर
के दाद मारा फरेब खुसरो (फारसी)

सपीत मन के दराये राखूँ
जो जाय पाऊँ पिया की खतियाँ (ब्रज)

किस्तों की मौत

एक दिन वह होगा
जब हम वक्त की कुदाल ले
टुकड़े टुकड़े कर देंगे
उस आखिरी उम्मीद के भी

जो एक दिन यूं ही
मेरे सफर के उन हर्फों से
बारहा उलझ बैठी थी
जिन्हें मैं कब का
तुम्हारे पास छोड़ आया था
मैं जो अपनी ज़ात के
जज्बात छोड़ आया था

उस एक दिन भी
मगर,
हम सुनेंगे
उस आखिरी उम्मीद की
आखिरी आरजू
जो टुकड़ों में बंटने से पहले
किस्तों में कटते जाने की
किस्तों में सजा मांगेगी

और
किस्तों में टूट फूट कर
किस्तों की मौत को हम
किस्तों में बांट लेंगे
उस एक दिन भी
हम चांद मांग लेंगे !

Friday, February 3, 2012

तुम्हारे बगैर

तुम्हारे बगैर
बहुत अच्छा हूं
बेहद खुश भी हूं
लड़ रहा हूं शिद्दत से
लड़ने की आदत जो है
रावी से लेकर यमुना तक
खिला खिला है सब
तुम्हारे बगैर ही

धूप के गाल सुर्ख हैं
गाढ़ी हरी हैं पत्तियां सब
तारीख भी वैसी ही सुस्त है
चाय के स्वाद में है
कटरे की खुशबू अब भी
उम्र को रोक, बढ़ता है
यूनिवर्सिटी का बूढ़ा बरगद भी

तुम्हारे बगैर
सब कुछ तो वैसा ही है
किस बात की कमी है
फिर सांस क्यूं थमी है?

Thursday, January 19, 2012

उनकी खातिर

समंदर पार एक दीवार की 
उस तस्वीर को निहारते हुए 
ये ख्याल आया 
कि वक्त के किसी फ्रेम में जड़ी हुई 
तुम ऐसी ही निहारती होगी समय को 
कि अब भी दिल में उठता होगा 
कुछ कर गुजरने का उबाल 
औरत होने की नियति के खिलाफ 
छटपटाती उठती होगी रुह 
कि सीने में बिछोह की नज्म लिए 
टूट जाती होगी हैरानियों की हद तक
कि एक दिन लिखोगी तुम भी
वजूद के दर्द का इतिहास
शायद जिंदा रहूंगा मैं भी
तुम्हारे लिखने के वादे के अंजाम तक
समंदर पार की वो दीवार
तुमसे मिलने को
लौटी है मेरे साथ ही
और लौट आया है एक शहर भी
मुझसे न सही
उनकी खातिर
लौट आना तुम भी
फुरसत मिले जब भी..........

Thursday, January 12, 2012

तुम्हारे दुख का सुख

तकलीफ का कोई अंत नहीं 
फिर भी
जब दिल के गोशों से गुजरती है
तुम्हें खोने की याद
जब आंख के कोनो में टूटता है
तुम्हारे होने का अक्स
जब बेखुदी की नसों में डूबता है
तुम्हारे अहसास का सूरज
जब होश की सरहदों में घुमड़ता है
तुम्हारे वजूद का नशा
जब कुछ नहीं का मानी होता है
बहुत कुछ
और बहुत कुछ होता है
कुछ भी हुए बगैर
जब उम्मीद की सिलों पर
नाउम्मीदी पीसती है
बीती यादों का दुख
और
समय की रेत पर धसक जाता है
तुम्हारे दुख का सुख
जब गले तक भरकर टूट जाता है
तकलीफ का बांध
वक्त के उस दौर में
जब वक्त ही नहीं होता
तकलीफ को आराम होता है.........

Sunday, January 8, 2012

सिसकती है एक उम्र

कुछ न कह सकने का दर्द 
बहुत भारी होता है।
इस दर्द के मलबे में
सिसकती है एक उम्र
इस उम्र के जीनों पर
चढ़ती है कोई आह
फिर आह के सीने में
नश्तर सी कोई चाह
सहना भी बहुत मुश्किल
कहना ही नहीं आसां।
रात की छत पर
फिर बैठे कई जुगनू
फिर पूछा वही किस्सा
फिर टूटा वही टांका
जख्मों की खुली आंखे
फिर कह दी कई बातें
फिर रह गई वही बातें
कुछ न कह सकने का दर्द
बहुत भारी होता है.....

तुमसे जिंदा सपनों के कदम

तुम्हारे होने से बड़ा है
तुम्हारा न होना
तुम नहीं हो तो
कभी नहीं टूटेगा
तुम्हारे होने का तिलिस्म
तुम होतीं तो 
टूट ही जाते
तिलिस्म के सात दरवाजे
तुम नहीं हो तो
समय से भी तेज है
तुमसे जिंदा सपनों के कदम
तुम होतीं तो
समय के बीतने में ही
बीत जाता कितना कुछ
तुम नहीं तो
क्या नहीं है मेरे पास
रात, चांद, धरती, आकाश
दर्द, नज्म, असर 
तुम और मेरा सफर
तुम होतीं तो 
जिस्म की खाल में सिल जातीं
ये सब सौगातें
तुम नहीं हो 
तो एक काश है 
कुछ पाने का अहसास है......

तुम्हें खोने का भी शुक्रिया!

मैं शुक्रिया अदा करता हूं 
तुम्हारे बालों का 
जिनकी नर्म सिलवटों ने 
एक उम्र उलझाए रखा मुझे
तुम्हारी आंख के नर्म कोरों का 
जिनके जंगलों में गुम हो गए 
मेरे वजूद की रात के सब तारे 
मुझे शुक्रिया करना है 
तुम्हारे होंठ से लिपटी नदी का 
जिसके पानियों ने अब तक जिंदा रखी 
मेरे वजूद की प्यास 
मुझ पर कर्ज है 
तुम्हारे सुस्त साए का 
जो बिजली की चकाचौध सा, गरजा किया 
मेरी नींद के ढ़लते आसमानों में 
कि शुक्राने की शक्ल में 
अब भी फंसी है 
मेरी सांस की तेज धौंकनी में 
तुम्हारी एक नज्म की फांस
दोस्त इस कदर शुक्रगुजार हूं तुम्हारा 
कि तुम्हें खोने का भी शुक्रिया!

जिंदा रही ये लड़की

कितना कुछ टूटता है
लड़की से औरत होने के बीच में
नाखूनों में फंसे आटे सी
कुलबुलाती है जिंदगी
सेवइयों पर बैठे दूध सी
ठहर जाती है जिंदगी
फिर एक दिन 
वक्त की खूंटी पर
टंग जाता है
उड़ते हुए सपनों का कैलेंडर
एक घर की चार दीवारें
और टूटकर झर जाता है
जेहन की आंखों का पलस्तर
तुम, जो औरत की कुदाल लेकर 
रोज ही मारती हो 
भीतर की लड़की को
तुम्हें कौन बताए 
कि तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद
जिंदा रही ये लड़की
आज भी जीती है मिरे वजूद में 
देखो तो 
कितनी बेअसर है 
तुम्हारे औरतपने की कुदाल!

Saturday, January 7, 2012

इल्तिजा

ये जो भी हुआ है,
हमारे खिलाफ गया है,
तुम लौट जाओ, 
तुमसे इल्तिजा है मेरी,
उफ! ये धमाके
ये शहर 
और तुम्हारा यकीन
वक्त कैसे निशान छोड़ गया है,
तुम जो इस शहर को ख्वाब कहती थीं,
मोती गूंथा गुलाब कहती थीं,
ये जो भी हुआ है
बहुत कुछ तोड़ गया है,
हमारे तमाम ख्वाब की
हद छोड़ गया है।

खुशबू

ये इत्तेफाक की बात है,
कि सहर की सांसों में घुली थी तुम्हारी खुशबू
और रात भर सोचते रहे हम सहर को
नींद और आंखों के बीच झूलती रही जुल्फ
मौत और जीस्त के बीच तैरते रहे सपने
सहर दबे पांव आई भी, मगर 
ये इत्तेफाक की बात है
तब तक आंख भारी थी
कि एक उम्र जग चुके थे,
हम पर नींद तारी थी।

ये बूंदें नमक सी लगती हैं, कल के घावों पर गिरती हैं, बारिश कुछ भी कर सकती है, गुजरा कल लौटा सकती है, ऐसी ही एक बारिश में, कुछ बातें भीग गई थीं, धूप का दावा जो भी हो, वे बातें अब भी गीली हैं, विष अब भी बेहद गहरा है, मेरी पलकें भी नीली हैं।

ये बूंदें नमक सी लगती हैं,
कल के घावों पर गिरती हैं,
बारिश कुछ भी कर सकती है,
गुजरा कल लौटा सकती है,
ऐसी ही एक बारिश में,
कुछ बातें भीग गई थीं,
धूप का दावा जो भी हो,
वे बातें अब भी गीली हैं,
ये बूंदें नमक सी लगती हैं,
कल के घावों पर गिरती हैं,
बारिश कुछ भी कर सकती है,
गुजरा कल लौटा सकती है,
ऐसी ही एक बारिश में,
कुछ बातें भीग गई थीं,
धूप का दावा जो भी हो,
वे बातें अब भी गीली हैं,
विष अब भी बेहद गहरा है,
मेरी पलकें भी नीली हैं।  अब भी बेहद गहरा है,
मेरी पलकें भी नीली हैं।..................................