Sunday, January 8, 2012

जिंदा रही ये लड़की

कितना कुछ टूटता है
लड़की से औरत होने के बीच में
नाखूनों में फंसे आटे सी
कुलबुलाती है जिंदगी
सेवइयों पर बैठे दूध सी
ठहर जाती है जिंदगी
फिर एक दिन 
वक्त की खूंटी पर
टंग जाता है
उड़ते हुए सपनों का कैलेंडर
एक घर की चार दीवारें
और टूटकर झर जाता है
जेहन की आंखों का पलस्तर
तुम, जो औरत की कुदाल लेकर 
रोज ही मारती हो 
भीतर की लड़की को
तुम्हें कौन बताए 
कि तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद
जिंदा रही ये लड़की
आज भी जीती है मिरे वजूद में 
देखो तो 
कितनी बेअसर है 
तुम्हारे औरतपने की कुदाल!

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