Thursday, January 19, 2012

उनकी खातिर

समंदर पार एक दीवार की 
उस तस्वीर को निहारते हुए 
ये ख्याल आया 
कि वक्त के किसी फ्रेम में जड़ी हुई 
तुम ऐसी ही निहारती होगी समय को 
कि अब भी दिल में उठता होगा 
कुछ कर गुजरने का उबाल 
औरत होने की नियति के खिलाफ 
छटपटाती उठती होगी रुह 
कि सीने में बिछोह की नज्म लिए 
टूट जाती होगी हैरानियों की हद तक
कि एक दिन लिखोगी तुम भी
वजूद के दर्द का इतिहास
शायद जिंदा रहूंगा मैं भी
तुम्हारे लिखने के वादे के अंजाम तक
समंदर पार की वो दीवार
तुमसे मिलने को
लौटी है मेरे साथ ही
और लौट आया है एक शहर भी
मुझसे न सही
उनकी खातिर
लौट आना तुम भी
फुरसत मिले जब भी..........

Thursday, January 12, 2012

तुम्हारे दुख का सुख

तकलीफ का कोई अंत नहीं 
फिर भी
जब दिल के गोशों से गुजरती है
तुम्हें खोने की याद
जब आंख के कोनो में टूटता है
तुम्हारे होने का अक्स
जब बेखुदी की नसों में डूबता है
तुम्हारे अहसास का सूरज
जब होश की सरहदों में घुमड़ता है
तुम्हारे वजूद का नशा
जब कुछ नहीं का मानी होता है
बहुत कुछ
और बहुत कुछ होता है
कुछ भी हुए बगैर
जब उम्मीद की सिलों पर
नाउम्मीदी पीसती है
बीती यादों का दुख
और
समय की रेत पर धसक जाता है
तुम्हारे दुख का सुख
जब गले तक भरकर टूट जाता है
तकलीफ का बांध
वक्त के उस दौर में
जब वक्त ही नहीं होता
तकलीफ को आराम होता है.........

Sunday, January 8, 2012

सिसकती है एक उम्र

कुछ न कह सकने का दर्द 
बहुत भारी होता है।
इस दर्द के मलबे में
सिसकती है एक उम्र
इस उम्र के जीनों पर
चढ़ती है कोई आह
फिर आह के सीने में
नश्तर सी कोई चाह
सहना भी बहुत मुश्किल
कहना ही नहीं आसां।
रात की छत पर
फिर बैठे कई जुगनू
फिर पूछा वही किस्सा
फिर टूटा वही टांका
जख्मों की खुली आंखे
फिर कह दी कई बातें
फिर रह गई वही बातें
कुछ न कह सकने का दर्द
बहुत भारी होता है.....

तुमसे जिंदा सपनों के कदम

तुम्हारे होने से बड़ा है
तुम्हारा न होना
तुम नहीं हो तो
कभी नहीं टूटेगा
तुम्हारे होने का तिलिस्म
तुम होतीं तो 
टूट ही जाते
तिलिस्म के सात दरवाजे
तुम नहीं हो तो
समय से भी तेज है
तुमसे जिंदा सपनों के कदम
तुम होतीं तो
समय के बीतने में ही
बीत जाता कितना कुछ
तुम नहीं तो
क्या नहीं है मेरे पास
रात, चांद, धरती, आकाश
दर्द, नज्म, असर 
तुम और मेरा सफर
तुम होतीं तो 
जिस्म की खाल में सिल जातीं
ये सब सौगातें
तुम नहीं हो 
तो एक काश है 
कुछ पाने का अहसास है......

तुम्हें खोने का भी शुक्रिया!

मैं शुक्रिया अदा करता हूं 
तुम्हारे बालों का 
जिनकी नर्म सिलवटों ने 
एक उम्र उलझाए रखा मुझे
तुम्हारी आंख के नर्म कोरों का 
जिनके जंगलों में गुम हो गए 
मेरे वजूद की रात के सब तारे 
मुझे शुक्रिया करना है 
तुम्हारे होंठ से लिपटी नदी का 
जिसके पानियों ने अब तक जिंदा रखी 
मेरे वजूद की प्यास 
मुझ पर कर्ज है 
तुम्हारे सुस्त साए का 
जो बिजली की चकाचौध सा, गरजा किया 
मेरी नींद के ढ़लते आसमानों में 
कि शुक्राने की शक्ल में 
अब भी फंसी है 
मेरी सांस की तेज धौंकनी में 
तुम्हारी एक नज्म की फांस
दोस्त इस कदर शुक्रगुजार हूं तुम्हारा 
कि तुम्हें खोने का भी शुक्रिया!

जिंदा रही ये लड़की

कितना कुछ टूटता है
लड़की से औरत होने के बीच में
नाखूनों में फंसे आटे सी
कुलबुलाती है जिंदगी
सेवइयों पर बैठे दूध सी
ठहर जाती है जिंदगी
फिर एक दिन 
वक्त की खूंटी पर
टंग जाता है
उड़ते हुए सपनों का कैलेंडर
एक घर की चार दीवारें
और टूटकर झर जाता है
जेहन की आंखों का पलस्तर
तुम, जो औरत की कुदाल लेकर 
रोज ही मारती हो 
भीतर की लड़की को
तुम्हें कौन बताए 
कि तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद
जिंदा रही ये लड़की
आज भी जीती है मिरे वजूद में 
देखो तो 
कितनी बेअसर है 
तुम्हारे औरतपने की कुदाल!

Saturday, January 7, 2012

इल्तिजा

ये जो भी हुआ है,
हमारे खिलाफ गया है,
तुम लौट जाओ, 
तुमसे इल्तिजा है मेरी,
उफ! ये धमाके
ये शहर 
और तुम्हारा यकीन
वक्त कैसे निशान छोड़ गया है,
तुम जो इस शहर को ख्वाब कहती थीं,
मोती गूंथा गुलाब कहती थीं,
ये जो भी हुआ है
बहुत कुछ तोड़ गया है,
हमारे तमाम ख्वाब की
हद छोड़ गया है।

खुशबू

ये इत्तेफाक की बात है,
कि सहर की सांसों में घुली थी तुम्हारी खुशबू
और रात भर सोचते रहे हम सहर को
नींद और आंखों के बीच झूलती रही जुल्फ
मौत और जीस्त के बीच तैरते रहे सपने
सहर दबे पांव आई भी, मगर 
ये इत्तेफाक की बात है
तब तक आंख भारी थी
कि एक उम्र जग चुके थे,
हम पर नींद तारी थी।

ये बूंदें नमक सी लगती हैं, कल के घावों पर गिरती हैं, बारिश कुछ भी कर सकती है, गुजरा कल लौटा सकती है, ऐसी ही एक बारिश में, कुछ बातें भीग गई थीं, धूप का दावा जो भी हो, वे बातें अब भी गीली हैं, विष अब भी बेहद गहरा है, मेरी पलकें भी नीली हैं।

ये बूंदें नमक सी लगती हैं,
कल के घावों पर गिरती हैं,
बारिश कुछ भी कर सकती है,
गुजरा कल लौटा सकती है,
ऐसी ही एक बारिश में,
कुछ बातें भीग गई थीं,
धूप का दावा जो भी हो,
वे बातें अब भी गीली हैं,
ये बूंदें नमक सी लगती हैं,
कल के घावों पर गिरती हैं,
बारिश कुछ भी कर सकती है,
गुजरा कल लौटा सकती है,
ऐसी ही एक बारिश में,
कुछ बातें भीग गई थीं,
धूप का दावा जो भी हो,
वे बातें अब भी गीली हैं,
विष अब भी बेहद गहरा है,
मेरी पलकें भी नीली हैं।  अब भी बेहद गहरा है,
मेरी पलकें भी नीली हैं।..................................

..........

आज की रात बड़ी लंबी है,
पार करने में टूट जाओगी,
आज जुगनू उदास बैठें हैं,
खुद जलोगी या जलाओगी,
आज फिर वक्त बीत जाएगा,
आज फिर सोचती रह जाओगी।....................................

जीने की सकत

जहां खत्म किया था,
वहीं "कुछ" छूट गया था,
न तुमने देखा
न मैने महसूस किया,
आज जब जीने की सकत नहीं बाकी,
आज जब हौसला भी फकत नहीं बाकी,
उम्र की ढाल बनकर बैठा है
आखिरी दीवार बनकर बैठा है,
वो जो "कुछ" छूट गया था
लहू के आर-पार बैठा है।

मंजिल

उस वक्त तुम्हारी कविता सुनकर सोचा था,
उम्र भर सुनता रहूंगा, बोलती कविता को,
उम्र भर करवट में होगा चांद,
रात की नदी में,
परछाइयां तमाम,
यकीन होगा तुम्हें?
इतने ख्वाब देखे थे मैने?
जितने छिपे थे आंसू,
तुम्हारी पलक की कोरों में,
तुम्हें ठहरने की आदत थी,
मुझे गुजर जाने का शौक,
तुम ठहर गईं,
मंजिल चल कर आएगी शायद,
मैं गुजर गया,
मंजिल तुम्हें ही मानकर,
ठहरने और गुजर जाने के बीच
फासला है, बहुत ज्यादा है,
रात पूनम की है,
चांद है तो, चांद आधा है!

इंतजार

तुमसे एक वादा था
तुम कहीं भी रहोगी
मुझे जानोगी
मुझे कुछ ऐसा करना होगा
तुम जान सको मेरे बारे में, बगैर कोशिश के
सब वैसा ही हुआ
जैसा तुमने चाहा था
मैने निभा दिया अपना वादा
अब बारी तुम्हारी है
टूटने की आखिरी हद तक
इंतजार रहेगा
तुम आओ
एक बार फिर
ताकि
मेरी टूटन पर
आखिरी मुहर तुम्हारी हो

ज्वार

ये उमस अब ठंडी हो चुकी है,
तुम्हारी याद की शबनम में घुलकर
सो चुकी है।
सोने दो, इसे अब मत जगाओ
ये झेलम की नदी खामोश है
मत ज्वार लाओ।
कहीं ऐसा न हो जाए, किनारे टूट जाएं
पीपल के साए में किए वादे कभी
आंख के मोती में बहकर फूट जाएं।

नव वर्ष 2012 की शुभकामनाएं

नव वर्ष 2012 की शुभकामनाएं

दूर देश से आने वाले,
दूर देश तक जाने वाले।
तम को दूर मिटाने वाले,
... ... नव वर्ष में जगाने वाले।

हिल मिल स्वागत करें सभी,
दो हजार बारह तुम आओ।
जीवन तम को दूर करो तुम ।
पुनः प्रकाशमय कर जाओे।

जीवन पथ पर, कर्मश्रेष्ठ हो,
उज्ज्वल कीर्ति, कान्ति कर दे ।
नवागन्तुक वर्ष तू आकर ,
जीवन में कुछ ऐसा कर दे।

‘‘मौन ’’कामना करता है यह,
हर्षोल्सित जीवन पथ होगा,
चहुओर कान्ति ,तुम्हारी होगी।
जब नव वर्ष का आगमन होगा।

सांस की तुरपन

दुख की एक गंगा है मेरे पास
और बहुत रेत है तुम्हारे सुख के तटों पर
इसी रेत की छांव में सूखा वक्त
आज भी उम्मीद से है
कि रेत से मिलेगी गंगा
और धुल जाएंगे पुराने जख्मों के निशां
समय बनाएगा कोई नया मकां
मगर सांस की तुरपन के टूटते टांके
और सफर के हाथ से छूटती सांकल
गवाह है
कि तुम्हारे बगैर पकी लम्हों की फसल
अपनी उपज में बिल्कुल तुम सी है
तुम सी ठहरी है फिर भी चलती है
वक्त के आगे बिखर गई सी है....

कर्ज

मुझे शुक्रिया करना है 
तुम्हारे होंठ से लिपटी नदी का 
जिसके पानियों ने अब तक जिंदा रखी 
मेरे वजूद की प्यास 
मुझ पर कर्ज है ........................................................

बेखुदी

तकलीफ का कोई अंत नहीं 
फिर भी
जब दिल के गोशों से गुजरती है
तुम्हें खोने की याद
जब आंख के कोनो में टूटता है
तुम्हारे होने का अक्स
जब बेखुदी की नसों में डूबता है
तुम्हारे अहसास का सूरज
जब होश की सरहदों में घुमड़ता है
तुम्हारे वजूद का नशा
जब कुछ नहीं का मानी होता है
बहुत कुछ
और बहुत कुछ होता है
कुछ भी हुए बगैर
जब उम्मीद की सिलों पर
नाउम्मीदी पीसती है
बीती यादों का दुख
और
समय की रेत पर धसक जाता है
तुम्हारे दुख का सुख
जब गले तक भरकर टूट जाता है
तकलीफ का बांध
वक्त के उस दौर में
जब वक्त ही नहीं होता
तकलीफ को आराम होता है.........

बेखुदी

जब बेखुदी की नसों में डूबता है
तुम्हारे अहसास का सूरज
जब होश की सरहदों में घुमड़ता है
तुम्हारे वजूद का नशा.....................................