Saturday, June 29, 2013

तुम जानते हो

दुनिया ने जब भी दर्द दिया 
तुमने सदा सँभाला मुझे
क्या सोचा है कभी
जो दर्द तुम दे गए
उसको लेकर मैं किधर जाऊँ?

ढ़ाल बनकर खड़े होते थे तुम
और अब हाथ में तलवार लिए खड़े हो
क्या कभी सोचा तुमने
कितने वार खाएँ हैं मैंने
इस बेदर्द ज़माने के
तो क्या तुम्हारा वार जाने दूँगी खाली?

तो फिर
मत सोचो इतना
और चला डालो अपना भी वार
मत चूको
वरना रह जाएगी
तुम्हारी तमन्ना अधूरी

तुम जानते हो
हाँ, बहुत अच्छी तरह
कि मैं नहीं देख पाती किसी की भी
अधूरी तमन्नाएँ
उन्हीं के लिए तो जिंदा रही अब तक
सबकी तमन्ना पूरी कर
मंज़िल तक ले जाना ही तो काम है मेरा
फिर तुमको कैसे निराश होने दूँ मैं

चलो तुम्हें भी तो
दिखा दूँ मंज़िल का रास्ता
और फिर टूट जाएँ ये साँसे
तो मलाल ना होगा
टूटती इन साँसों के लबों पर
बस इक तेरा ही नाम होगा 

खुशहाल घर को जाने नज़र किसकी लग गई

हम तो ये बात जान के हैरान हैं बहुत
खामोशियों में शोर के तूफ़ान हैं बहुत 

बाज़ार जा के खुद का कभी दाम पूछना 
तुम जैसे हर दूकान में सामान हैं बहुत 

अच्छा सा कामकाज खुली आँख से चुनो
ख़्वाबों के लेन देन में नुकसान है बहुत

आवाज़ बर्तनों की घरों में दबी रहे
बाहर जो सुनने वालें हैं शैतान हैं बहुत

खुशहाल घर को जाने नज़र किसकी लग गई
हम लोग कुछ दिनों से परेशान हैं बहुत

आवाज़ साथ है न बदन का कहीं पता
अब के सफर में रास्ते सूनसान हैं बहुत

Tuesday, December 4, 2012

(मुनव्वर राना)

नए कमरों में चीजे पुरानी कौन रखता है,
परिंदों के लिए शहरो में पानी कौन रखता है,
ये तो हमी थे जो गिरती हुई दीवार को थामे रहे वर्ना,
सलीके से बुजुर्गो की निशानी कौन रखता है
(मुनव्वर राना)

हुकूमत

मै दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है ,
हुकूमत के इशारे पे तो मुर्दा बोल सकता है ,
यहाँ पे नफरतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये है ,
लुटी इस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है 
हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती ,
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है .

Again Amazing Lines By Munawwar Rana

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं

उछलते—खेलते बचपन में बेटा ढूँढती होगी
तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है

Again Amazing Lines By Munawwar Rana

उठ मेरी जान

तू जो बेजान खिलोनों से बहल जाती है 
तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है 
पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है 
बनके सीमाब हर इक जर्फ में ढल जाती है 
जिस्त के आहनी साँचे में ढलना है तुझे 
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

अंधकार बढ़ता जाता है!!" -- हरिवंशराय बच्चन

अंधकार बढ़ता जाता है!!

मिटता अब तरु-तरु में अंतर,
तम की चादर हर तरुवर पर,
केवल ताड़ अलग हो सबसे अपनी सत्ता बतलाता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

दिखलाई देता कुछ-कुछ मग,
जिसपर शंकित हो चलते पग,
दूरी पर जो चीजें उनमें केवल दीप नजर आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

ड़र न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा स्वर कर
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!"
-- हरिवंशराय बच्चन