Wednesday, November 2, 2011

धूम्रपान एक कार्य महान

धूम्रपान
एक कार्य महान

सिगरेट
है संजीवनी
पीकर
स्वास्थ्य बनाओ

समय
से पहले बूढ़े होकर
रियायतों
का लाभ उठाओ

सिगरेट
पीकर ही
हैरी और माइकल निकलते हैं

दूध
और फल खाकर तो
हरगोपाल
बनते हैं

जो
नहीं पीते उन्हें
इस
सुख से अवगत कराओ

बस में रेल में घर में जेल में
सिगरेट
सुलगाओ

अगर
पैसे कम हैं
फिर
भी काम चला लो

जरूरी
नहीं है सिगरेट
कभी कभी बीड़ी सुलगा लो

बीड़ी
सफलता की सीढ़ी
इस
पर चढ़ते चले जाओ

मेहनत
की कमाई
सही
काम में लगाओ

जो
हड्डियां गलाते हैं
वो
तपस्वी कहलाते हैं


कलयुग के दधीचि
हड्डियों
के साथ करो
फेफड़े
और गुर्दे भी कुर्बान

क्योंकि
धूम्रपान
एक कार्य महान

सहर

ये इत्तेफाक की बात है,
कि सहर की सांसों में घुली थी तुम्हारी खुशबू
और रात भर सोचते रहे हम सहर को
नींद और आंखों के बीच झूलती रही जुल्फ
मौत और जीस्त के बीच तैरते रहे सपने
सहर दबे पांव आई भी, मगर 
ये इत्तेफाक की बात है
तब तक आंख भारी थी
कि एक उम्र जग चुके थे,
हम पर नींद तारी थी।

Tuesday, November 1, 2011

tanha

Tujse ab koi vasta nai raha fir bi ....
Tere hisse ka wakt aj bi tanha hi gujarta hain ....

veeran

Dil ki gaagar se saat sagar se chhalke hai toh kyon yeh
Paancho dariya bhi hairaan ho gaye ..
Saath mere tha jab mera, ab toh yeh veeran ho gaye ..

खुशगुमानी

ये सोचा नहीं है किधर जाएँगे
मगर हम यहाँ से गुज़र जाएँगे

इसी खौफ से नींद आती नहीं
कि हम ख्वाब देखेंगे डर जाएँगे

डराता बहुत है समन्दर हमें
समन्दर में इक दिन उतर जाएँगे

जो रोकेगी रस्ता कभी मंज़िलें
घड़ी दो घड़ी को ठहर जाएँगे

कहाँ देर तक रात ठहरी कोई
किसी तरह ये दिन गुज़र जाएँगे

इसी खुशगुमानी ने तनहा किया
जिधर जाऊँगा, हमसफ़र जाएँगे

बदलता है सब कुछ तो 'आलम' कभी
ज़मीं पर सितारे बिखर जाएँगे. ---- आलम खुर्शीद.

फ़ासले

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं

ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहनेवाले
जीनेवाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं

फ़ासले उम्र के कुछ और बढा़ देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं

चंद मासूम से पत्तों का लहू है "फ़ाकिर"
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं
------सुदर्शन फ़ाकिर.