13-14 वीं शताब्दी के मशहूर कवि, लेखक, संगीतकार अमीर खुसरो की "जिहाल ए
मिस्कीं" शीर्षक से अदभूत रचना जो एक साथ फारसी और ब्रज भाषा दोनो में
थी। हिंदू और मुसलमान के नाम पर बांटने वाले हमारे वक्त के पैगंबरों को
यह विरासत कब समझ में आएगी ?--
जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल (फारसी)
दुराय नैना बनाय बतियाँ (ब्रज)
किताबे हिज्राँ, न दारम ऐ जाँ (फारसी)
न लेहु काहे लगाय छतियाँ (ब्रज)
शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ
बरोजे वसलत चूँ उम्र कोताह (फारसी)
सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ। (ब्रज)
यकायक अज़दिल दू चश्मे जादू
बसद फरेबम बवुर्द तस्कीं (फारसी)
किसे पड़ी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतिया (ब्रज)
चूँ शम्आ सोजाँ, चूँ जर्रा हैराँ
हमेशा गिरियाँ ब इश्के आँ माह (फारसी)
न नींद नैंना न अंग चैना (हिंदी)
न आप आये न भेजे पतियाँ
बहक्के रोजे विसाले दिलबर
के दाद मारा फरेब खुसरो (फारसी)
सपीत मन के दराये राखूँ
जो जाय पाऊँ पिया की खतियाँ (ब्रज)
मिस्कीं" शीर्षक से अदभूत रचना जो एक साथ फारसी और ब्रज भाषा दोनो में
थी। हिंदू और मुसलमान के नाम पर बांटने वाले हमारे वक्त के पैगंबरों को
यह विरासत कब समझ में आएगी ?--
जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल (फारसी)
दुराय नैना बनाय बतियाँ (ब्रज)
किताबे हिज्राँ, न दारम ऐ जाँ (फारसी)
न लेहु काहे लगाय छतियाँ (ब्रज)
शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ
बरोजे वसलत चूँ उम्र कोताह (फारसी)
सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ। (ब्रज)
यकायक अज़दिल दू चश्मे जादू
बसद फरेबम बवुर्द तस्कीं (फारसी)
किसे पड़ी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतिया (ब्रज)
चूँ शम्आ सोजाँ, चूँ जर्रा हैराँ
हमेशा गिरियाँ ब इश्के आँ माह (फारसी)
न नींद नैंना न अंग चैना (हिंदी)
न आप आये न भेजे पतियाँ
बहक्के रोजे विसाले दिलबर
के दाद मारा फरेब खुसरो (फारसी)
सपीत मन के दराये राखूँ
जो जाय पाऊँ पिया की खतियाँ (ब्रज)
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