Sunday, January 8, 2012

तुम्हें खोने का भी शुक्रिया!

मैं शुक्रिया अदा करता हूं 
तुम्हारे बालों का 
जिनकी नर्म सिलवटों ने 
एक उम्र उलझाए रखा मुझे
तुम्हारी आंख के नर्म कोरों का 
जिनके जंगलों में गुम हो गए 
मेरे वजूद की रात के सब तारे 
मुझे शुक्रिया करना है 
तुम्हारे होंठ से लिपटी नदी का 
जिसके पानियों ने अब तक जिंदा रखी 
मेरे वजूद की प्यास 
मुझ पर कर्ज है 
तुम्हारे सुस्त साए का 
जो बिजली की चकाचौध सा, गरजा किया 
मेरी नींद के ढ़लते आसमानों में 
कि शुक्राने की शक्ल में 
अब भी फंसी है 
मेरी सांस की तेज धौंकनी में 
तुम्हारी एक नज्म की फांस
दोस्त इस कदर शुक्रगुजार हूं तुम्हारा 
कि तुम्हें खोने का भी शुक्रिया!

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