Thursday, January 19, 2012

उनकी खातिर

समंदर पार एक दीवार की 
उस तस्वीर को निहारते हुए 
ये ख्याल आया 
कि वक्त के किसी फ्रेम में जड़ी हुई 
तुम ऐसी ही निहारती होगी समय को 
कि अब भी दिल में उठता होगा 
कुछ कर गुजरने का उबाल 
औरत होने की नियति के खिलाफ 
छटपटाती उठती होगी रुह 
कि सीने में बिछोह की नज्म लिए 
टूट जाती होगी हैरानियों की हद तक
कि एक दिन लिखोगी तुम भी
वजूद के दर्द का इतिहास
शायद जिंदा रहूंगा मैं भी
तुम्हारे लिखने के वादे के अंजाम तक
समंदर पार की वो दीवार
तुमसे मिलने को
लौटी है मेरे साथ ही
और लौट आया है एक शहर भी
मुझसे न सही
उनकी खातिर
लौट आना तुम भी
फुरसत मिले जब भी..........

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