Saturday, February 25, 2012

ठांव बंधु !

निराला की लेखनी के बारे में कुछ कह सकना मेरे बस की बात नहीं है, बस निराला की इस कविता को पढ़ते रहने की अंतहीन ऋंखला है....जो आज भी जारी है...

बांधो न नांव इस ठांव बंधु !
पूछेगा सारा गांव बंधु !
यह घाट वही जिस पर हंसकर 
वह कभी नहाती थी धंसकर
आंखें रह जाती थीं फंसकर 
कंपते थे दोनों पांव बंधु !
बांधो न नांव इस ठांव बंधु !

वह हंसी बहुत कुछ कहती थी
फिर भी अपने में रहती थी
सबकी सुनती थी सहती थी
देती थी सबके दांव बंधु !
बांधो न नांव इस ठांव बंधु !

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