Tuesday, December 4, 2012

अंधकार बढ़ता जाता है!!" -- हरिवंशराय बच्चन

अंधकार बढ़ता जाता है!!

मिटता अब तरु-तरु में अंतर,
तम की चादर हर तरुवर पर,
केवल ताड़ अलग हो सबसे अपनी सत्ता बतलाता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

दिखलाई देता कुछ-कुछ मग,
जिसपर शंकित हो चलते पग,
दूरी पर जो चीजें उनमें केवल दीप नजर आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

ड़र न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा स्वर कर
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!"
-- हरिवंशराय बच्चन

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