ख्याल पर इससे बेहतर ख्याल क्या हो सकता है। दिल के बहुत भीतर की तड़प को वैसी की वैसी स्याही में उतार देने वाले यूपी के अमरोहा में जन्मे पाकिस्तान के मशहूर और अदभुत प्रतिभा के धनी कलमकार जॉन एलिया की कलम से--
कब उसका बिसाल चाहिए था
बस एक ख्याल चाहिए था
कब दिल को जवाब से गर्ज थी
होठों को सवाल चाहिए था............
.............................. .
वह मेरा ख्याल थी, सो वह थी
मैं उसका ख्याल था, सो मैं था
अब दोनो ख्याल मर चुके हैं........
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और जहां सारे शब्द खत्म हो जाते हैं, सोच खत्म हो जाती है, वहां फैज के शब्द शुरू होते हैं---
न दीद (दृष्टि) है, न सुखन (शब्द), न हर्फ है न पयाम
कोई भी हीला ए तस्कीन (राहत का कोई बहाना) नहीं, और आस बहुत है
उम्मीद ए यार, नजर का मिजाज, दर्द का रंग
तुम आज कुछ भी न पूछो कि दिल उदास बहुत है.....
कब उसका बिसाल चाहिए था
बस एक ख्याल चाहिए था
कब दिल को जवाब से गर्ज थी
होठों को सवाल चाहिए था............
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वह मेरा ख्याल थी, सो वह थी
मैं उसका ख्याल था, सो मैं था
अब दोनो ख्याल मर चुके हैं........
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और जहां सारे शब्द खत्म हो जाते हैं, सोच खत्म हो जाती है, वहां फैज के शब्द शुरू होते हैं---
न दीद (दृष्टि) है, न सुखन (शब्द), न हर्फ है न पयाम
कोई भी हीला ए तस्कीन (राहत का कोई बहाना) नहीं, और आस बहुत है
उम्मीद ए यार, नजर का मिजाज, दर्द का रंग
तुम आज कुछ भी न पूछो कि दिल उदास बहुत है.....
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