बुझने चला है अब इस ज़िन्दगी का अलाव
साँसे भी गीली लकड़ियों सी दुन्धाने लगी है
हो सके तो आ कर बुझा दे इस इंतज़ार को
दर्द के धूं से रूह की आँखें डब-डबाने लगी है
साँसे भी गीली लकड़ियों सी दुन्धाने लगी है
हो सके तो आ कर बुझा दे इस इंतज़ार को
दर्द के धूं से रूह की आँखें डब-डबाने लगी है