Saturday, January 7, 2012

इल्तिजा

ये जो भी हुआ है,
हमारे खिलाफ गया है,
तुम लौट जाओ, 
तुमसे इल्तिजा है मेरी,
उफ! ये धमाके
ये शहर 
और तुम्हारा यकीन
वक्त कैसे निशान छोड़ गया है,
तुम जो इस शहर को ख्वाब कहती थीं,
मोती गूंथा गुलाब कहती थीं,
ये जो भी हुआ है
बहुत कुछ तोड़ गया है,
हमारे तमाम ख्वाब की
हद छोड़ गया है।

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