कुछ न कह सकने का दर्द
बहुत भारी होता है।
इस दर्द के मलबे में
सिसकती है एक उम्र
इस उम्र के जीनों पर
चढ़ती है कोई आह
फिर आह के सीने में
नश्तर सी कोई चाह
सहना भी बहुत मुश्किल
कहना ही नहीं आसां।
रात की छत पर
फिर बैठे कई जुगनू
फिर पूछा वही किस्सा
फिर टूटा वही टांका
जख्मों की खुली आंखे
फिर कह दी कई बातें
फिर रह गई वही बातें
कुछ न कह सकने का दर्द
बहुत भारी होता है.....
बहुत भारी होता है।
इस दर्द के मलबे में
सिसकती है एक उम्र
इस उम्र के जीनों पर
चढ़ती है कोई आह
फिर आह के सीने में
नश्तर सी कोई चाह
सहना भी बहुत मुश्किल
कहना ही नहीं आसां।
रात की छत पर
फिर बैठे कई जुगनू
फिर पूछा वही किस्सा
फिर टूटा वही टांका
जख्मों की खुली आंखे
फिर कह दी कई बातें
फिर रह गई वही बातें
कुछ न कह सकने का दर्द
बहुत भारी होता है.....
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