Tuesday, December 4, 2012

(मुनव्वर राना)

नए कमरों में चीजे पुरानी कौन रखता है,
परिंदों के लिए शहरो में पानी कौन रखता है,
ये तो हमी थे जो गिरती हुई दीवार को थामे रहे वर्ना,
सलीके से बुजुर्गो की निशानी कौन रखता है
(मुनव्वर राना)

हुकूमत

मै दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है ,
हुकूमत के इशारे पे तो मुर्दा बोल सकता है ,
यहाँ पे नफरतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये है ,
लुटी इस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है 
हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती ,
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है .

Again Amazing Lines By Munawwar Rana

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं

उछलते—खेलते बचपन में बेटा ढूँढती होगी
तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है

Again Amazing Lines By Munawwar Rana

उठ मेरी जान

तू जो बेजान खिलोनों से बहल जाती है 
तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है 
पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है 
बनके सीमाब हर इक जर्फ में ढल जाती है 
जिस्त के आहनी साँचे में ढलना है तुझे 
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

अंधकार बढ़ता जाता है!!" -- हरिवंशराय बच्चन

अंधकार बढ़ता जाता है!!

मिटता अब तरु-तरु में अंतर,
तम की चादर हर तरुवर पर,
केवल ताड़ अलग हो सबसे अपनी सत्ता बतलाता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

दिखलाई देता कुछ-कुछ मग,
जिसपर शंकित हो चलते पग,
दूरी पर जो चीजें उनमें केवल दीप नजर आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

ड़र न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा स्वर कर
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!"
-- हरिवंशराय बच्चन

''रिश्ते''

रिश्ते 

कभी हमारे मन भाते हैं,

कभी हैं इनसे दिल जलते,
कभी हमें ख़ुशी दे जाते हैं,

कभी हैं इनसे गम मिलते,
कभी निभाना मुश्किल इनको,

कभी हैं इनसे दिन चलते,
कभी तोड़ देते ये दिल को,

कभी होंठ इनसे हिलते,
कभी ये लेते कीमत खुद की,

कभी ये खुद ही हैं लुटते,
कभी जोड़ लेते ये जग को,

कभी रोशनी से कटते,
कभी चमक दे जाते मुख पर,

कभी हैं इनसे हम छिपते,
कभी हमारे दुःख हैं बांटते,

कभी यही हैं दुःख देते,
इतने पर भी हर जीवन के प्राणों में ये हैं बसते,
और नहीं कोई नाम है इनका हम सबके प्यारे''रिश्ते''

अस्तित्व

मुहब्बत 
दीप शिखा 
और नदी का प्रवाह 
तीनो में कितनी समानता है
जब तक 
मिट न जाये अस्तित्व 
तब तक 
थमने का नाम नहीं लेती
तीनों

आज भी जिन्दा है..एहसास तेरा!

दूब के कोमल तिनकोँ पर

मखमली ओस की

बूंदोँ की तरह

फैली है आज भी

मन के आंगन मेँ

तेरे एहसास की खुश्बू,

¤

तेरे संग

बिताये लम्होँ की एक किरण

चली आती है

चुपके से मेँरे पास

जैसे कोई भँबरा

फूलोँ के इर्द-गिर्द

मंडराता है

तेरा एहसास भी

घेर लेता है

मुझे

अपनी परछाइयोँ के बीच(दरमियां)

¤

तन्हाई की दहलीज पर

जैसे

ठण्डा,मंद हवा का

कोई एक झोँका

भर देता है

तन मेँ सिहरन,

¤

तेरा एहसास भी

दिल के हर कोने मेँ

अपनी

अमिट छाप छोड़ जाता है

फूलोँ मेँ निहित खुश्बू की तरह

मेँरे भीतर

आज भी जिन्दा है..एहसास तेरा!