Saturday, January 7, 2012

बेखुदी

तकलीफ का कोई अंत नहीं 
फिर भी
जब दिल के गोशों से गुजरती है
तुम्हें खोने की याद
जब आंख के कोनो में टूटता है
तुम्हारे होने का अक्स
जब बेखुदी की नसों में डूबता है
तुम्हारे अहसास का सूरज
जब होश की सरहदों में घुमड़ता है
तुम्हारे वजूद का नशा
जब कुछ नहीं का मानी होता है
बहुत कुछ
और बहुत कुछ होता है
कुछ भी हुए बगैर
जब उम्मीद की सिलों पर
नाउम्मीदी पीसती है
बीती यादों का दुख
और
समय की रेत पर धसक जाता है
तुम्हारे दुख का सुख
जब गले तक भरकर टूट जाता है
तकलीफ का बांध
वक्त के उस दौर में
जब वक्त ही नहीं होता
तकलीफ को आराम होता है.........

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