मुझे शुक्रिया करना है
तुम्हारे होंठ से लिपटी नदी का
जिसके पानियों ने अब तक जिंदा रखी
मेरे वजूद की प्यास
मुझ पर कर्ज है ........................................................
तुम्हारे होंठ से लिपटी नदी का
जिसके पानियों ने अब तक जिंदा रखी
मेरे वजूद की प्यास
मुझ पर कर्ज है ........................................................
No comments:
Post a Comment