दुख की एक गंगा है मेरे पास
और बहुत रेत है तुम्हारे सुख के तटों पर
इसी रेत की छांव में सूखा वक्त
आज भी उम्मीद से है
कि रेत से मिलेगी गंगा
और धुल जाएंगे पुराने जख्मों के निशां
समय बनाएगा कोई नया मकां
मगर सांस की तुरपन के टूटते टांके
और सफर के हाथ से छूटती सांकल
गवाह है
कि तुम्हारे बगैर पकी लम्हों की फसल
अपनी उपज में बिल्कुल तुम सी है
तुम सी ठहरी है फिर भी चलती है
वक्त के आगे बिखर गई सी है....
और बहुत रेत है तुम्हारे सुख के तटों पर
इसी रेत की छांव में सूखा वक्त
आज भी उम्मीद से है
कि रेत से मिलेगी गंगा
और धुल जाएंगे पुराने जख्मों के निशां
समय बनाएगा कोई नया मकां
मगर सांस की तुरपन के टूटते टांके
और सफर के हाथ से छूटती सांकल
गवाह है
कि तुम्हारे बगैर पकी लम्हों की फसल
अपनी उपज में बिल्कुल तुम सी है
तुम सी ठहरी है फिर भी चलती है
वक्त के आगे बिखर गई सी है....
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