Saturday, January 7, 2012

मंजिल

उस वक्त तुम्हारी कविता सुनकर सोचा था,
उम्र भर सुनता रहूंगा, बोलती कविता को,
उम्र भर करवट में होगा चांद,
रात की नदी में,
परछाइयां तमाम,
यकीन होगा तुम्हें?
इतने ख्वाब देखे थे मैने?
जितने छिपे थे आंसू,
तुम्हारी पलक की कोरों में,
तुम्हें ठहरने की आदत थी,
मुझे गुजर जाने का शौक,
तुम ठहर गईं,
मंजिल चल कर आएगी शायद,
मैं गुजर गया,
मंजिल तुम्हें ही मानकर,
ठहरने और गुजर जाने के बीच
फासला है, बहुत ज्यादा है,
रात पूनम की है,
चांद है तो, चांद आधा है!

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