Tuesday, December 4, 2012

उठ मेरी जान

तू जो बेजान खिलोनों से बहल जाती है 
तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है 
पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है 
बनके सीमाब हर इक जर्फ में ढल जाती है 
जिस्त के आहनी साँचे में ढलना है तुझे 
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

अंधकार बढ़ता जाता है!!" -- हरिवंशराय बच्चन

अंधकार बढ़ता जाता है!!

मिटता अब तरु-तरु में अंतर,
तम की चादर हर तरुवर पर,
केवल ताड़ अलग हो सबसे अपनी सत्ता बतलाता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

दिखलाई देता कुछ-कुछ मग,
जिसपर शंकित हो चलते पग,
दूरी पर जो चीजें उनमें केवल दीप नजर आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!

ड़र न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा स्वर कर
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है!!
अंधकार बढ़ता जाता है!!"
-- हरिवंशराय बच्चन

''रिश्ते''

रिश्ते 

कभी हमारे मन भाते हैं,

कभी हैं इनसे दिल जलते,
कभी हमें ख़ुशी दे जाते हैं,

कभी हैं इनसे गम मिलते,
कभी निभाना मुश्किल इनको,

कभी हैं इनसे दिन चलते,
कभी तोड़ देते ये दिल को,

कभी होंठ इनसे हिलते,
कभी ये लेते कीमत खुद की,

कभी ये खुद ही हैं लुटते,
कभी जोड़ लेते ये जग को,

कभी रोशनी से कटते,
कभी चमक दे जाते मुख पर,

कभी हैं इनसे हम छिपते,
कभी हमारे दुःख हैं बांटते,

कभी यही हैं दुःख देते,
इतने पर भी हर जीवन के प्राणों में ये हैं बसते,
और नहीं कोई नाम है इनका हम सबके प्यारे''रिश्ते''

अस्तित्व

मुहब्बत 
दीप शिखा 
और नदी का प्रवाह 
तीनो में कितनी समानता है
जब तक 
मिट न जाये अस्तित्व 
तब तक 
थमने का नाम नहीं लेती
तीनों

आज भी जिन्दा है..एहसास तेरा!

दूब के कोमल तिनकोँ पर

मखमली ओस की

बूंदोँ की तरह

फैली है आज भी

मन के आंगन मेँ

तेरे एहसास की खुश्बू,

¤

तेरे संग

बिताये लम्होँ की एक किरण

चली आती है

चुपके से मेँरे पास

जैसे कोई भँबरा

फूलोँ के इर्द-गिर्द

मंडराता है

तेरा एहसास भी

घेर लेता है

मुझे

अपनी परछाइयोँ के बीच(दरमियां)

¤

तन्हाई की दहलीज पर

जैसे

ठण्डा,मंद हवा का

कोई एक झोँका

भर देता है

तन मेँ सिहरन,

¤

तेरा एहसास भी

दिल के हर कोने मेँ

अपनी

अमिट छाप छोड़ जाता है

फूलोँ मेँ निहित खुश्बू की तरह

मेँरे भीतर

आज भी जिन्दा है..एहसास तेरा!

Wednesday, May 23, 2012

एक चुटकी नींद

राही मासूम रजा को जीते हुए..

एक चुटकी नींद की मिलती नहीं
अपने ज़ख़्मों पर छिड़कने के लिए
हाय हम किस शहर में मारे गये

घंटियाँ बजती हैं
ज़ीने पर कदम की चाप है
फिर कोई बेचेहरा होगा
मुँह में होगी जिसके मक्खन की ज़ुबान
सीने में होगा जिसके इक पत्थर का दिल
मुस्कुराकर मेरे दिल का इक वरक़ ले जाएगा ......

Friday, April 27, 2012

आंख की जमीन

अश्क का साथ छूटा 
तो आंखे उदास थीं
और 
तुमसे बहुत नाराज भी
तुमने छीन जो ली थी
उनकी अमानत सब
अगर लौटा सको
तो देर मत करना
कि आंख की जमीन 
अब भी सूखी है
और
अश्क की तो जात पर ही
आफत है
गुनाह था
जी भर के देखने का महज
तुमने तो बारिश चुरा ली आंखों से.........