Saturday, June 29, 2013

खुशहाल घर को जाने नज़र किसकी लग गई

हम तो ये बात जान के हैरान हैं बहुत
खामोशियों में शोर के तूफ़ान हैं बहुत 

बाज़ार जा के खुद का कभी दाम पूछना 
तुम जैसे हर दूकान में सामान हैं बहुत 

अच्छा सा कामकाज खुली आँख से चुनो
ख़्वाबों के लेन देन में नुकसान है बहुत

आवाज़ बर्तनों की घरों में दबी रहे
बाहर जो सुनने वालें हैं शैतान हैं बहुत

खुशहाल घर को जाने नज़र किसकी लग गई
हम लोग कुछ दिनों से परेशान हैं बहुत

आवाज़ साथ है न बदन का कहीं पता
अब के सफर में रास्ते सूनसान हैं बहुत

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