Saturday, January 7, 2012

जीने की सकत

जहां खत्म किया था,
वहीं "कुछ" छूट गया था,
न तुमने देखा
न मैने महसूस किया,
आज जब जीने की सकत नहीं बाकी,
आज जब हौसला भी फकत नहीं बाकी,
उम्र की ढाल बनकर बैठा है
आखिरी दीवार बनकर बैठा है,
वो जो "कुछ" छूट गया था
लहू के आर-पार बैठा है।

मंजिल

उस वक्त तुम्हारी कविता सुनकर सोचा था,
उम्र भर सुनता रहूंगा, बोलती कविता को,
उम्र भर करवट में होगा चांद,
रात की नदी में,
परछाइयां तमाम,
यकीन होगा तुम्हें?
इतने ख्वाब देखे थे मैने?
जितने छिपे थे आंसू,
तुम्हारी पलक की कोरों में,
तुम्हें ठहरने की आदत थी,
मुझे गुजर जाने का शौक,
तुम ठहर गईं,
मंजिल चल कर आएगी शायद,
मैं गुजर गया,
मंजिल तुम्हें ही मानकर,
ठहरने और गुजर जाने के बीच
फासला है, बहुत ज्यादा है,
रात पूनम की है,
चांद है तो, चांद आधा है!

इंतजार

तुमसे एक वादा था
तुम कहीं भी रहोगी
मुझे जानोगी
मुझे कुछ ऐसा करना होगा
तुम जान सको मेरे बारे में, बगैर कोशिश के
सब वैसा ही हुआ
जैसा तुमने चाहा था
मैने निभा दिया अपना वादा
अब बारी तुम्हारी है
टूटने की आखिरी हद तक
इंतजार रहेगा
तुम आओ
एक बार फिर
ताकि
मेरी टूटन पर
आखिरी मुहर तुम्हारी हो

ज्वार

ये उमस अब ठंडी हो चुकी है,
तुम्हारी याद की शबनम में घुलकर
सो चुकी है।
सोने दो, इसे अब मत जगाओ
ये झेलम की नदी खामोश है
मत ज्वार लाओ।
कहीं ऐसा न हो जाए, किनारे टूट जाएं
पीपल के साए में किए वादे कभी
आंख के मोती में बहकर फूट जाएं।

नव वर्ष 2012 की शुभकामनाएं

नव वर्ष 2012 की शुभकामनाएं

दूर देश से आने वाले,
दूर देश तक जाने वाले।
तम को दूर मिटाने वाले,
... ... नव वर्ष में जगाने वाले।

हिल मिल स्वागत करें सभी,
दो हजार बारह तुम आओ।
जीवन तम को दूर करो तुम ।
पुनः प्रकाशमय कर जाओे।

जीवन पथ पर, कर्मश्रेष्ठ हो,
उज्ज्वल कीर्ति, कान्ति कर दे ।
नवागन्तुक वर्ष तू आकर ,
जीवन में कुछ ऐसा कर दे।

‘‘मौन ’’कामना करता है यह,
हर्षोल्सित जीवन पथ होगा,
चहुओर कान्ति ,तुम्हारी होगी।
जब नव वर्ष का आगमन होगा।

सांस की तुरपन

दुख की एक गंगा है मेरे पास
और बहुत रेत है तुम्हारे सुख के तटों पर
इसी रेत की छांव में सूखा वक्त
आज भी उम्मीद से है
कि रेत से मिलेगी गंगा
और धुल जाएंगे पुराने जख्मों के निशां
समय बनाएगा कोई नया मकां
मगर सांस की तुरपन के टूटते टांके
और सफर के हाथ से छूटती सांकल
गवाह है
कि तुम्हारे बगैर पकी लम्हों की फसल
अपनी उपज में बिल्कुल तुम सी है
तुम सी ठहरी है फिर भी चलती है
वक्त के आगे बिखर गई सी है....

कर्ज

मुझे शुक्रिया करना है 
तुम्हारे होंठ से लिपटी नदी का 
जिसके पानियों ने अब तक जिंदा रखी 
मेरे वजूद की प्यास 
मुझ पर कर्ज है ........................................................